एक इत्तेफाक था… या किस्मत का इशारा?

ना तुम मुझे जानते थे, ना मैं तुम्हें…

भीड़ में लाखों चेहरे थे, पर नज़र तुम पर ही ठहर गई।

पहली मुलाकात में ही, दिल ने कहा – “यही है वो।”

अजनबी थे हम, पर बातों में अपनापन था।

तुम मिले तो लगा, जैसे किस्मत मुस्कुरा दी।

ना कोई वादा, ना कोई इरादा…

फिर भी रिश्ता बन गया, बिना नाम के।

बातें छोटी थीं, पर एहसास गहरे थे।

वो इत्तेफाक धीरे-धीरे, मेरी आदत बन गया।

अब हर दिन तुमसे शुरू, और तुम पर ही खत्म होता है

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तुझसे मिलना इत्तेफाक था, पर तुझे चाहना मेरा फैसला है… ❤️🔥