Bhogvad Aur Pradushan Se Dharti Ka Vinash Par Quotes |आँकड़ों में दर्ज होती धरती की मौत

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Bhogvad Aur Pradushan Se Dharti Ka Vinash Par Quotes |आँकड़ों में दर्ज होती धरती की मौत-आज धरती किसी प्राकृतिक आपदा से नहीं,*इंसान की आदतों से मर रही है।**भोगवाद, स्वार्थ, युद्ध और प्रदूषण —ये सब मिलकर धरती के सीने परएक के बाद एक घाव छोड़ रहे हैं।जो बात कभी चेतावनी थी,**आँकड़ों में दर्ज सच्चाई** बन चुकी है।

## 📊 **कड़वे लेकिन सच्चे आँकड़े**

## 📊 **कड़वे लेकिन सच्चे आँकड़े**
## 📊 **कड़वे लेकिन सच्चे आँकड़े**

• हर साल दुनिया में **70 लाख से अधिक मौतें** वायु प्रदूषण से होती हैं।
• विश्व की **99% आबादी** असुरक्षित हवा में साँस ले रही है।
• पिछले 10 साल मानव इतिहास के **सबसे गर्म वर्ष** रहे हैं।
• हर साल लगभग **1 करोड़ हेक्टेयर जंगल** खत्म हो जाते हैं।
• समुद्र में हर साल **80 लाख टन प्लास्टिक** पहुँचता है।
• युद्धों में मरने वालों में **60% आम नागरिक** होते हैं।

👉 ये आँकड़े भविष्य नहीं, **वर्तमान की रिपोर्ट** हैं।

# 🌫️ **प्रदूषण पर शायरी 

# 🌫️ **प्रदूषण पर शायरी 
# 🌫️ **प्रदूषण पर शायरी 

1.

साँसों में ज़हर भर गया, फिर भी हम चुप रहे,
शहर बड़े होते गए, इंसान घटते रहे।

2.

हवा अब दुआ नहीं, सज़ा बन चुकी है,
तरक्की की कीमत जान बन चुकी है।

3.

धुएँ में लिपटी सुबह, ज़हर भरी शाम है,
कहते हैं इसे विकास, कितना झूठा नाम है।

4.

नदियाँ रोती रहीं, हम तस्वीरें खींचते रहे,
ज़हर पीकर भी पानी को पवित्र कहते रहे।

5.

बीमार साँसें, थका बदन, कारण कोई नहीं पूछता,
प्रदूषण मार रहा है, पर दोष कोई नहीं स्वीकारता।

6.

हवा ने भी अब सवाल पूछने छोड़ दिए,
क्योंकि इंसान ने जवाब देना छोड़ दिया।

7.

जिस हवा में जान थी, वही आज जान लेती है,
इंसान की लापरवाही हर रोज़ मौत देती है।

8.

कागज़ों में सब साफ़ है, शहर दमघोंटू क्यों है?
अगर विकास सही है, तो ये सब क्यों है?

9.

धुएँ से ढका सूरज भी अब शर्मिंदा लगता है,
इंसान आज खुद से ही ज़िंदा लगता है।

10.

प्रदूषण कोई हादसा नहीं,
ये इंसान की रोज़ की आदत है।

# 🌳 **भोगवाद पर शायरी

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# 🌳 **भोगवाद पर शायरी
# 🌳 **भोगवाद पर शायरी

11.

ज़रूरतें कम थीं, लालच बहुत बड़ा निकला,
धरती थक गई, इंसान नहीं पिघला।

12.

सब कुछ चाहिए, अभी चाहिए, ज्यादा चाहिए,
इसी चाहत ने धरती को बर्बाद कर दिया।

13.

सुविधा के नाम पर जंगल कटते रहे,
हम आराम में थे, पेड़ मरते रहे।

14.

भोग की भूख ने विवेक को खा लिया,
धरती को भी इस्तेमाल की चीज़ बना दिया।

15.

जिस मिट्टी ने पाला, उसी को खोद डाला,
इंसान ने अपने ही घर को उजाड़ डाला।

16.

कभी संतोष भी इंसान की पहचान था,
आज लालच ही उसका भगवान है।

17.

हमने ज़रूरत से ज़्यादा लिया, लौटाया कुछ नहीं,
फिर पूछते हैं — धरती क्यों थक गई?

18.

भोगवाद का नशा ऐसा चढ़ा,
इंसान को इंसान दिखना ही बंद पड़ा।

19.

घर बड़े होते गए, दिल छोटे हो गए,
संसाधन खत्म हुए, पर शौक पूरे हो गए।

20.

इंसान की चाहतें अनंत हैं,
धरती के संसाधन सीमित हैं।

# ⚔️ **युद्ध और स्वार्थ पर शायरी 

# ⚔️ **युद्ध और स्वार्थ पर शायरी 
# ⚔️ **युद्ध और स्वार्थ पर शायरी 


21.

युद्ध का फैसला कागज़ों में होता है,
मौत का हिसाब गलियों में।

22.

सत्ता की भूख में इंसान जला दिए गए,
इतिहास में बस नंबर जोड़ दिए गए।

23.

नेता सुरक्षित, जनता शिकार,
युद्ध का यही असली व्यापार।

24.

सरहदें बचीं या नहीं पता नहीं,
इंसानियत जरूर हार गई।

25.

बच्चे लाशों के बीच बड़े हो रहे हैं,
और हम इसे राजनीति कह रहे हैं।

26.

युद्ध किसी समस्या का हल नहीं,
ये इंसान की सबसे बड़ी नाकामी है।

27.

हथियार बनते रहे, इंसान घटते गए,
शांति के नारे सिर्फ भाषण बनते गए।

28.

लाशों पर जीत का झंडा गाड़ दिया,
किसी ने इंसानियत का मातम नहीं मनाया।

29.

स्वार्थ की आग में दुनिया जल रही है,
और इंसान तालियाँ बजा रहा है।

30.

युद्ध खत्म होगा, तब भी घाव रहेंगे,
इतिहास में नहीं, दिलों में रहेंगे।

# 🐾 **प्रकृति और बेजुबानों पर शायरी 

बेजुबान पर पढें
31.

क़सूर उनका नहीं था जो बोल न सके,
हम दोषी थे जो सब समझकर भी चुप रहे।

32.

जानवर मरते रहे, जंगल कटते रहे,
इंसान फायदे गिनता रहा।

33.

धरती माँ थी, हमने बाज़ार बना दिया,
हर रिश्ते को व्यापार बना दिया।

34.

पेड़ों की चीखें कोई सुनता नहीं,
क्योंकि वो भाषा इंसान समझता नहीं।

35.

बेजुबानों की खामोशी सबसे ऊँची आवाज़ है,
बस इंसान सुनना नहीं चाहता।

36.

जिस धरती ने सब दिया,
उसी को सबसे ज़्यादा चोट मिली।

37.

जानवर भी अब इंसान से डरते हैं,
कभी इंसान भी उनसे सीखता था।

38.

प्रकृति ने कभी कुछ माँगा नहीं,
इंसान ने फिर भी सब छीन लिया।

39.

जंगल खाली हुए, शहर भरते गए,
इंसान अकेले होते गए।

40.

धरती रो रही है,
और इंसान सेल्फी ले रहा है।

🌍 : आँकड़े और धरती की कहानी

🌍 : आँकड़े और धरती की कहानी
🌍 : आँकड़े और धरती की कहानी


41.
हर साल 12 करोड़ पेड़ काटे जाते हैं,
धरती रोती है, पर इंसान नफा गिनता है
Har saal 12 crore ped kaate jaate hain,
Dharatee rotee hai, par insaan nafa ginta hai

42.
1.3 अरब टन CO₂ वायुमंडल में घुला,
हमारे लालच ने हवा को ज़हर बना डाला
1.3 arab ton CO₂ vaayumandal mein ghula,
Hamare laalach ne hawa ko zahar bana daala

43.
75% मीठे पानी की नदियाँ प्रदूषण में डूबी हैं,
धरती की पीड़ा अब आँकड़ों में छुपी है
75% meethe paanee ki nadiyan pradushan mein doobi hain,
Dharatee ki peeda ab aankdon mein chhupi hai

44.
हर साल 50 लाख जानवर मानव लालच के शिकार होते हैं,
प्रकृति की सज़ा इंसान भुगतता है
Har saal 50 lakh jaanwar manav laalach ke shikaar hote hain,
Prakriti ki saza insaan bhugta hai

45.
अंटार्कटिका के ग्लेशियर तेज़ी से पिघल रहे हैं,
जलवायु परिवर्तन धरती को बदल रहा है
Antarktika ke glacier tezee se pighal rahe hain,
Jalvaayu parivartan dharatee ko badal raha hai

46.
समुद्र में प्लास्टिक अब समुद्री जीवन को निगल रहा है,
भोग की यह भूख हर जीव को मार रही है
Samudr mein plastic ab samudree jeevan ko nigal raha hai,
Bhog ki yah bhookh har jeev ko maar rahi hai

47.
हर 8 सेकंड में एक पेड़ कटता है,
धरती के आँसू अब आँकड़ों में दर्ज हैं
Har 8 second mein ek ped katta hai,
Dharatee ke aansoo ab aankdon mein darj hain

48.
मानव के लालच से तटीय शहर डूबने के कगार पर,
धरती की चुप पीड़ा किसी ने नहीं सुनी
Manav ke laalach se tatīya shahar doobne ke kagaar par,
Dharatee ki chup peeda kisi ne nahin suni

49.
भोगवाद और प्रदूषण ने 40% जंगलों को खत्म कर दिया,
धरती की मौत आँकड़ों में दर्ज है
Bhogvad aur pradushan ne 40% jangalon ko khatm kar diya,
Dharatee ki maut aankdon mein darj hai

50.
अगर इंसान नहीं रुका तो आने वाले 20 साल में 50 करोड़ लोग पानी के लिए तरसेंगे,
धरती की चीखें अब भी सुनाई नहीं देती
Agar insaan nahin ruka to aane wale 20 saal mein 50 crore log paanee ke liye tarasenge,
Dharatee ki cheekhen ab bhee sunai nahin deti

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