एक हसरत थी…
तुम्हें अपना कहने की…
तुम मिले भी… पर किस्मत नहीं मिली…
नज़दीकियां बढ़ी… पर फासले भी साथ आए…
दिल चाहता था तुमको…
पर लब कुछ कह न पाए…
एक ख्वाब था…
जो अधूरा रह गया…
तुम सामने थे…
फिर भी मेरा न हो सके
हसरतें बढ़ती गईं… और हम चुप होते गए…
तुम्हारी यादें…
अब मेरी आदत बन गई हैं…
कुछ बातें अधूरी रहीं…
कुछ एहसास दब गए…
मोहब्बत पूरी न सही…
पर सच्ची जरूर थी…
अब बस एक हसरत है…
तुम खुश रहो…
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और मेरी अधूरी मोहब्बत…
कहानी बन जाए…