Bejubaan Jaanavaron Kee Cheekh|बेज़ुबानों की चीखें और इंसान की चुप्पी

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Bejubaan Jaanavaron Kee Cheekh|बेज़ुबानों की चीखें और इंसान की चुप्पी-दोस्तों  यूँ  तो हम  खुद को  इंसान  कहते  हैं,लेकिन सबसे ज़्यादा हिंसा भी हमने ही की है।भोजन, भोग-विलास और परंपरा के नाम पर बेज़ुबान जानवरों पर रोज़ अपराध हो रहे हैं।यह पोस्ट शायरी नहीं, सच्चाई है —एक ऐसा सच जो इंसान को उसकी असली शक्ल दिखाता है।अगर ये शब्द असहज करते हैं, तो समझिए सवाल सही जगह लगा

Bejubaan Jaanavaron Kee Cheekh|बेज़ुबानों की चीखें और इंसान की चुप्पी
Bejubaan Jaanavaron Kee Cheekh|बेज़ुबानों की चीखें और इंसान की चुप्पी

1. हत्या को “भोजन” कहना
जानवरों को मारा जाता है
सिर्फ़ इसलिए कि हमारी जीभ को स्वाद चाहिए।
ये भोजन नहीं है,
ये किसी ज़िंदा प्राणी की छीनी हुई ज़िंदगी है।
अगर भूख लगने पर किसी को मारना सही है,
तो फिर इंसान और जानवर में फर्क ही क्या बचा?

2. भोग-विलास के लिए खून

हम खाते हैं, उड़ाते हैं, फेंकते हैं।
और कहते हैं — “ये तो जानवर है।”
इंसान ने अपने मज़े को
किसी की साँसोंको  स्वाद  बना लिया है।
यही सबसे बड़ा अपराध है।

3. सड़कों पर रोज़ होने वाले जुर्म
गाड़ी से कुचल देना
पत्थर मारना
भूखे जानवर को भगाना
घायल को मरने के लिए छोड़ देना
जिस समाज मेंतड़पते हुए जानवर पर कोई नहीं रुकता,
वहाँ इंसानियत पहले ही मर चुकी होती है।

4. “धर्म” के नाम पर हिंसा
हम पूजा भी करते हैं
और उसी धरती पर खून भी बहाते हैं।

अगर ईश्वर को खून चाहिए,
तो फिर वो ईश्वर नहीं,
इंसान की स्वाद के लिए बनाई हिंसा है।

5. प्रयोग, मनोरंजन और कैद
सर्कस, लैब, चिड़ियाघर, रील्स…

जानवर को खिलौना बनाकर
इंसान खुद को सभ्य कहता है।

असल में ये सभ्यता नहीं,
क्रूरता को सजाकर पेश करना है।

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6. सबसे बड़ा झूठ
हम कहते हैं —
“जानवर बोल नहीं सकते।”वो बोलते नहीं,
पर उनकी आँखें बहुत कुछ कहती हैं।फर्क सिर्फ़ इतना है
कि हमें सुनना नहीं आता।

7. सवाल जो हर इंसान से है
क्या स्वाद के बिना ज़िंदगी नहीं चल सकती?
क्या दया कमजोरी है?
क्या ज़मीर सिर्फ़ इंसानों के लिए होता है?
क्यूँ इंसान नेदया भाव छोड़ दिया,?

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Bejubaan Jaanavaron Kee Cheekh|बेज़ुबानों की चीखें और इंसान की चुप्पी

8.
इंसान की नफरत ने खो दिया इंसानियत का रंग,
जानवरों की आंखों में दिखती है केवल डर की झलक।

9.
मांस की लालसा में काटे गए मासूमों के जीवन के सपने,
कोई रोता है, कोई डरता है, पर इंसान बस खा जाता है।

10.
भोग-विलास के नाम पर बर्बाद होती ज़िंदगी,
हर दर्द, हर चीख इंसान के हाथों लिखी गई कहानी।

11.
खुशबू, मिठास और दावत के पीछे छुपा है दर्द,
जानवरों की मासूमियत से खेल रहा है ये संसार।

12.
कभी सोचा है तुमने, जिस मांस को खाते हो,
उसकी आँखों में भी सपने थे, उसकी भी थी कोई कहानी।

13.
पालतू जानवर भी नहीं बचे इंसान की लालच से,
उनकी निष्ठा का जवाब मिला केवल पीड़ा और चोट।

14.
जो सोते थे खुले आसमान के तले,
अब इंसान की हवस ने उन्हें बंदी बना दिया।

15.
दिखावे और दिखावे की दुनिया में,
जानवरों का दर्द बन गया केवल खबर का हिस्सा।

16.
काटो, मारो, भोगो, और दिखाओ अपनी ताकत,
पर क्या ये इंसानियत है या सिर्फ़ छलावा और जाति का खेल?

17.
जानवरों की मासूम आँखों में लिखा है दर्द,
इंसान की हवस ने उन्हें बना दिया एक खेल का जरद।

18.
भोग और विलास के लिए बर्बाद होती ज़िंदगियाँ,
मांस, खाल और शोहरत की खातिर, टूटते हैं उनके सपने।

19.
हर काट, हर चोट, इंसान की लालसा की गवाही देती है,
जो चुप नहीं रह सकता, वो बस सहता है।

20.
खून और दर्द के पीछे छुपा है इंसान का स्वार्थ,
जानवरों की पीड़ा बनी बस मनोरंजन का भाग।

21.
अंधाधुंध शिकार, बंदी बनाना, और फिर मार डालना,
ये इंसानियत नहीं, ये क्रूरता का प्रमाण है।

22.
जिस मांस के लिए तुमने उनकी ज़िंदगी छीनी,
वहीं आँखें अब भी तुम्हें सवाल पूछती हैं।

23.
पालतू भी नहीं बचे इंसान की निष्ठुरता से,
उनकी वफादारी का बदला मिला सिर्फ़ चोट और डर से।

24.
दिखावे के लिए पालतू जानवर को सजाना,
और उसके दर्द को नजरअंदाज करना, ये इंसान का खेल है।

25.
भोजन की लालसा में मासूम प्राणों की बलि,
हर काट इंसान की हसरत और क्रूरता की कहानी बताती है।

26.
अदब, नफासत और संवेदनशीलता कहाँ खो गई,
जब इंसान की हवस जानवरों के जीवन को चीर रही है।

27.
खुली आँखों के सामने होती है बर्बादी,
फिर भी इंसान का दिल नहीं झुकता, बस हँसी और खेल चलता है।

28.
सजावट, दावत और दिखावा बन गए जंजीरें,
जानवरों की पीड़ा छिपी हुई, पर सच अब भी उजागर है।

29.
जिसने काटा, मारा और भोगा,
क्या उसने कभी सोचा उनके सपनों और डर के बारे में?

30.
इंसानियत की मरम्मत अब भी हो सकती है,
अगर हम जानवरों के दर्द को समझें और उनकी रक्षा करें।

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