ये आख़िरी मुलाक़ात थी, पर हमने माना नहीं

तू  मुस्कराई मैं डर गया…

क्योंकि ये मुस्कान अलविदा जैसी थी।

हम मिले थे प्यार से, जुदा होने के बहाने ढूँढते हुए।

तू कहता रहा— “मजबूरी है

और मैं मानता रहा— “शायद सच हो

आख़िरी मुलाक़ात अक्सर अचानक होती है।

कोई कहकर नहीं जाता— “मैं अब लौटूँगा नहीं।”

11. तेरी आँखें कुछ कह रही थीं, होंठ झूठ बोल रहे थे।

मैंने सवाल नहीं किया, डर था—सच सुन लूँगा।

तू मुझे छोड़ रहा था, पर वजह किसी और की थी।

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तेरे बाद मैं हर मुलाक़ात से डरने लगा।