Dharatee Kee Pukaar quotes|धरती की पुकार सुनो2026

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Dharatee Kee Pukaar quotes|धरती की पुकार सुनो2026-आज धरती मर रही है, लेकिन उसकी मौत किसी अख़बार की हेडलाइन नहीं बनती।भोगवाद की अंधी दौड़ और बढ़ता प्रदूषण धरती को धीरे-धीरे खत्म कर रहा है।कभी जंगल कटते हैं, कभी नदियाँज़हरहैं, कभी हवा साँस लेने लायक नहीं बचती।आँकड़े चीख-चीख कर सच्चाई बताते हैं, पर इंसान कानों में लालच की रुई ठूँस कर बैठा है।यह पोस्ट उन्हीं आँकड़ों, दर्द और सच्चाई को भावनात्मक शायरी के ज़रिये सामने रखती है —
ताकि दिल हिले… और शायद इंसान बदल जाए।

📊 कड़वे सच – आँकड़ों में धरती का दर्द
हर साल 1 करोड़ हेक्टेयर जंगल खत्म हो रहे हैं
90% लोग ज़हरीली हवा में साँस ले रहे हैं
हर साल 80 लाख टन प्लास्टिक समुद्र में
1970 से अब तक वन्यजीवों की संख्या 69% घट चुकी है
आने वाले 30 सालों में कई शहर पानी के लिए तरसेंगे

🔥 1: भोगवाद की अंधी दौड़ 

🔥  1: भोगवाद की अंधी दौड़ 
🔥 1: भोगवाद की अंधी दौड़ 


1.
जितना चाहिए था उतना कभी काफी नहीं लगा,
भोग के नशे में इंसान को धरती का दर्द मह्सुश नही हुआ
jitana chaahie tha utana kabhee kaaphee nahin laga,
bhog ke nashe mein insaan ko dharatee ka dard mahsush nahee hua

2.
सुविधा की भूख में सब कुछ जला डाला,
कल की सांसों का आज सौदा कर डाला
Suvidha kee bhookh mein sab kuch jala daala,
Kal kee saanson ka aaj sauda kar daala

3.
शौक़ बड़े होते गए, ज़मीर छोटा हो गया,
धरती रोती रही और इंसान अमीर हो गया
Shauq bade hote gaye, zameer chhota ho gaya,
Dharatee rotee rahee aur insaan ameer ho gaya

4.
जरूरत और लालच का फर्क भूल गया इंसान,
इसी भूल ने लिख दिया धरती का नुकसान
Zaroorat aur laalach ka fark bhool gaya insaan,
Isi bhool ne likh diya dharatee ka nuksaan

5.
जो चीज़ें फेंक दीं, वही कल ज़हर बनीं,
भोग की लत में सच्चाई पीछे रह गई
Jo cheezen phenk deen, vahi kal zahar baneen,
Bhog kee lat mein sachchaaee peeche rah gayee

6.
इंसान ने आराम चुना, प्रकृति को थकाया,
अपनी ही माँ को धीरे-धीरे मरवाया
Insaan ne aaraam chuna, prakriti ko thakaaya,
Apanee hee maan ko dheere-dheere marvaaya

7.
जितना मिला उतना कम लगा उसे,
धरती टूटती रही, दिखा नहीं उसे
Jitna mila utna kam laga use,
Dharatee toottee rahee, dikha nahin use

8.
भोगवाद ने संवेदनाएँ छीन लीं,
धरती की चीखें स्क्रीन में दब गईं
Bhogvad ne samvedanaen chheen leen,
Dharatee kee cheekhen screen mein dab gayeen

9.
सुविधा का ताज पहनकर बैठा इंसान,
नीचे कुचली जा रही धरती की जान
Suvidha ka taaj pehnkar baitha insaan,
Neeche kuchlee ja rahee dharatee kee jaan

10.
जिसने सब कुछ पाने की ठानी थी,
उसी ने सब कुछ खोने की कहानी लिखी थी
Jisne sab kuch paane kee thani thee,
Usi ne sab kuch khone kee kahanee likhee thee

 प्रदूषण – ज़हरीली हवा, ज़हरीला कल

 प्रदूषण – ज़हरीली हवा, ज़हरीला कल
 प्रदूषण – ज़हरीली हवा, ज़हरीला कल


11.
हवा में ज़हर, पानी में दर्द भरा है,
फिर भी इंसान कहता है — सब ठीक चल रहा है
Hawa mein zahar, paanee mein dard bhara hai,
Phir bhee insaan kahta hai — sab theek chal raha hai

12.
साँस लेना अब भी सौभाग्य लगता है,
क्योंकि हवा भी आज सवाल पूछती है
Saas lena ab bhee saubhagya lagta hai,
Kyonki hawa bhee aaj sawaal poochtee hai

13.
धुएँ में लिपटी हर सुबह कहती है,
इंसान, तू खुद को ही मार रहा है
Dhuein mein liptee har subah kahti hai,
Insaan, tu khud ko hee maar raha hai

14.
नदियाँ अब आईना नहीं रहीं,
हमारे पाप धोने की नालियाँ बन गईं
Nadiyan ab aaina nahin raheen,
Hamare paap dhone kee naaliyan ban gayeen

15.
पेड़ कटे, धुआँ बढ़ा, शोर हुआ,
फिर पूछा — मौसम क्यों बदल गया?
Ped kate, dhuaan badha, shor hua,
Phir poochha — mausam kyon badal gaya?

16.
जो हवा जान देती थी, वही जान ले रही है,
ये विकास की नहीं, विनाश की कहानी है
Jo hawa jaan deti thee, vahi jaan le rahi hai,
Ye vikaas kee nahin, vinaash kee kahanee hai

17.
मास्क चेहरे पर, अपराध ज़मीर पर,
प्रदूषण का बोझ धरती के सीने पर
Maask chehre par, apraadha zameer par,
Pradushan ka bojh dharatee ke seene par

18.
शहर चमक रहे हैं, आसमान काला है,
इंसान अमीर है, लेकिन भविष्य खाली है
Shahar chamak rahe hain, aasman kaala hai,
Insaan ameer hai, lekin bhavishya khaalee hai

19.
ज़हर हमने फैलाया, मौत धरती ने सही,
फिर भी दोष कुदरत पर ही थोप दिया
Zahar hamne phailaaya, maut dharatee ne sahi,
Phir bhee dosh kudrat par hee thop diya

20.
अगर साँस भी बिकने लगी बाज़ार में,
तो समझो इंसान हार गया इंसान से
Agar saans bhee bikne lagi bazaar mein,
Toh samajho insaan haar gaya insaan se

🌍  3: धरती की चुप मौत 

🌍  3: धरती की चुप मौत 
🌍  3: धरती की चुप मौत 


21.
धरती मरी नहीं, धीरे-धीरे मार दी गई,
हर साल थोड़ी-थोड़ी काट दी गई
Dharatee mari nahin, dheere-dheere maar dee gayee,
Har saal thodee-thodee kaat dee gayee

22.
न रोई, न चिल्लाई, बस सहती रही,
माँ थी इसलिए सब कुछ सहती रही
Na roee, na chillaee, bas sahtee rahee,
Maan thee isliye sab kuch sahtee rahee

23.
आँकड़ों में दर्ज हुई उसकी मौत,
लेकिन इंसान ने महसूस नहीं की चोट
Aankdon mein darj huee uskee maut,
Lekin insaan ne mahsush nahin kee chot

24.
धरती की खामोशी सबसे बड़ा इल्ज़ाम है,
क्योंकि उसके सब्र का फायदा उठाया इंसान ने
Dharatee kee khaamoshee sabse bada ilzaam hai,
Kyonki uske sabr ka faayda uthaya insaan ne

25.
पेड़ गिरे तो खबर नहीं बनी,
शहर डूबे तब आँख खुली
Ped gire to khabar nahin bani,
Shahar doobe tab aankh khuli

26.
जो सबको जीवन देती थी,
उसी को जीने का हक़ नहीं दिया
Jo sabko jeevan deti thee,
Usi ko jeene ka haq nahin diya

27.
धरती का दर्द शब्दों में नहीं आता,
वरना इंसान आज शर्म से मर जाता
Dharatee ka dard shabdon mein nahin aata,
Varna insaan aaj sharm se mar jaata

28.
मौत उसकी चुप थी,
और कातिल हम सब थे
Maut uskee chup thee,
Aur kaatil hum sab the

29.
जब धरती थकेगी पूरी तरह,
इंसान बच नहीं पाएगा किसी तरह
Jab dharatee thakegee pooree tarah,
Insaan bach nahin paayega kisi tarah

30.
आज नहीं समझे तो कल पछतावा होगा,
धरती के बिना कोई विकास नहीं होगा
Aaj nahin samjhe to kal pachtawa hoga,
Dharatee ke bina koi vikaas nahin hoga

🌱  4: चेतावनी और उम्मीद 

धरती पर यह कविता

🌱  4: चेतावनी और उम्मीद 
🌱  4: चेतावनी और उम्मीद 


31.
अब भी वक्त है संभल जाने का,
धरती को फिर से मुस्कुराने का
Ab bhee vakt hai sambhal jaane ka,
Dharatee ko phir se muskurane ka

32.
विकास वही जो जीवन बचाए,
ना कि ऐसा जो सब कुछ मिटाए
Vikaas vahi jo jeevan bachaaye,
Na ki aisa jo sab kuch mitaae

33.
पेड़ लगाना अब पूजा है,
धरती को बचाना सबसे बड़ा व्रत है
Ped lagaana ab pooja hai,
Dharatee ko bachaana sabse bada vrat hai

34.
कम में जीना सीख ले इंसान,
वरना खत्म हो जाएगी ये पहचान
Kam mein jeena seekh le insaan,
Varna khatm ho jaayegi ye pehchaan

35.
धरती नहीं बचेगी तो क्या बचाओगे,
सोने-चाँदी से साँस नहीं खरीद पाओगे
Dharatee nahin bachegee to kya bachaoge,
Sone-chaandee se saans nahin khareed paoge

36.
प्रकृति से लड़कर कोई जीता नहीं,
इतिहास गवाह है — कोई बचा नहीं
Prakriti se ladkar koi jeeta nahin,
Itihaas gaavah hai — koi bacha nahin

37.
एक पेड़, एक सोच, एक कदम,
यही बचा सकता है आने वाला कल
Ek ped, ek soch, ek kadam,
Yehee bacha sakta hai aane wala kal

38.
धरती को बचाना कोई विकल्प नहीं,
ये हमारी आख़िरी ज़िम्मेदारी है
Dharatee ko bachaana koi vikalp nahin,
Ye hamaree aakheree zimmedaaree hai

39.
जब इंसान सुधरेगा, धरती बचेगी,
वरना ये कहानी यहीं थम जाएगी
Jab insaan sudhrega, dharatee bachegee,
Varna ye kahanee yahi tham jaayegi

40.
आज लिखी ये शायरी चेतावनी है,
कल ये इतिहास बन जाए — यही डरावनी है
Aaj likhee ye shayari chetawanee hai,
Kal ye itihaas ban jaaye — yehee daraavanee hai

41.
हर साल 1 करोड़ पेड़ कट रहे हैं,
अब भी वक्त है संभलने का, धरती को बचाने का
Har saal 1 crore ped kat rahe hain,
Ab bhee vakt hai sambhalne ka, dharatee ko bachaane ka

42.
90% लोग ज़हरीली हवा में साँस ले रहे हैं,
संवेदनाएँ जगाकर बदलो ये दौर
90% log zahreeli hawa mein saans le rahe hain,
Samvedanaen jagakar badlo ye daur

43.
हर साल 80 लाख टन प्लास्टिक समुद्र में गिरता है,
अगर रुके तो समुद्र और जीवन बच जाएगा
Har saal 80 lakh ton plastic samudr mein girta hai,
Agar ruke to samudr aur jeevan bacha jaayega

44.
वन्यजीवों की संख्या 69% घट चुकी है,
अब भी पेड़ लगाकर हम जीवन बचा सकते हैं
Vanyajeevon ki sankhya 69% ghat chuki hai,
Ab bhee ped lagaakar hum jeevan bacha sakte hain

45.
जलवायु परिवर्तन ने मौसम बदल दिया है,
अगर इंसान समझे, तो कल फिर से हरा हो सकता है
Jalvaayu parivartan ne mausam badal diya hai,
Agar insaan samjhe, to kal phir se hara ho sakta hai

46.
भोग और प्रदूषण ने नदियाँ ज़हरीली कर दी हैं,
लेकिन हम बदलाव ला सकते हैं, अभी भी वक्त है
Bhog aur pradushan ne nadiyan zahreeli kar dee hain,
Lekin hum badlaav la sakte hain, abhi bhee vakt hai

47.
शहरों में धुएँ की चादर है,
लेकिन इंसान पेड़ लगाकर आसमान साफ़ कर सकता है
Shahron mein dhuein ki chaadar hai,
Lekin insaan ped lagaakar aasman saaf kar sakta hai

48.
भोग की लत ने इंसान को अंधा कर दिया,
लेकिन अगर सुधरे, तो धरती मुस्कुराएगी
Bhog ki lat ne insaan ko andha kar diya,
Lekin agar sudhre, to dharatee muskurayegi

49.
अगर इंसान ने चेतावनी नहीं सुनी,
तो आने वाला कल सिर्फ़ अफ़सोस और विनाश लाएगा
Agar insaan ne chetawani nahin suni,
To aane wala kal sirf afsos aur vinaash laayega

50.
लेकिन उम्मीद अभी भी है, अगर इंसान ने हाथ बढ़ाया,
धरती फिर से हरी-भरी और जीवन से भर जाएगी
Lekin ummeed abhi bhee hai, agar insaan ne haath badhaaya,
Dharatee phir se hari-bhari aur jeevan se bhar jaayegi

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FAQ

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🌍 Dharti Ki Pukar Kavita (दिल छूने वाली)

मैं धरती हूँ…
वही, जिस पर तुमने चलना सीखा,
वही, जिसने तुम्हें हर दर्द से बचाया,
पर आज… मेरा दर्द सुनने वाला कोई नहीं।

कभी मेरे आंचल में हरियाली थी,
हर पेड़ मेरा गहना था,
आज वही आंचल सूना है,
जैसे किसी माँ का आँचल उजड़ गया हो।

मेरी नदियाँ कभी गुनगुनाती थीं,
आज खामोशी में सिसकती हैं,
तुम्हारे लालच के जहर से,
मेरी हर धड़कन डरती है।

तुमने काट दिए मेरे सपनों के पेड़,
जला दिए मेरे अरमानों के जंगल,
मैं चुप रही… क्योंकि मैं माँ थी,
पर अब मेरा धैर्य भी टूट रहा है।

मेरी हवाएँ अब बोझिल हैं,
हर सांस में दर्द छुपा है,
तुम्हारी तरक्की की कीमत पर,
मेरा अस्तित्व ही मिट रहा है।

क्या तुम्हें मेरी खामोशी सुनाई नहीं देती?
क्या तुम्हें मेरा दर्द दिखाई नहीं देता?
मैं हर दरार में तुम्हें पुकार रही हूँ,
क्या तुम्हारा दिल अब पत्थर हो गया है?

अभी भी वक्त है… मुझे बचा लो,
फिर से मेरे आंचल को सजा लो,
क्योंकि अगर मैं खत्म हो गई,
तो तुम्हारा कल भी खत्म हो जाएगा।

मैं धरती हूँ…
तुम्हारी माँ हूँ…
मुझे दर्द मत दो,
बस थोड़ा सा प्यार दे दो… 🌍💔

🌍 धरती पुकारे – कविता (दिल को छूने वाली)
धरती पुकारे, सुन लो मेरी आवाज,
मैं ही हूँ तुम्हारी शुरुआत, मैं ही हूँ तुम्हारा आज।

मेरे आंचल में तुमने बचपन बिताया,
मेरी गोद में ही हर सपना सजाया,
आज वही आंचल खाली पड़ा है,
हर कोना दर्द से भरा पड़ा है।

मेरे पेड़ थे मेरे गहने, मेरी पहचान,
तुमने ही छीना मेरा हर अरमान,
अब हरियाली की जगह सन्नाटा है,
मेरे दिल में बस एक ही नाता है—दर्द का।

मेरी नदियाँ जो गीत सुनाती थीं,
आज खामोशी में आँसू बहाती हैं,
तुम्हारे स्वार्थ ने ऐसा जख्म दिया,
कि मेरा हर कतरा अब रोता है।

मैंने तुम्हें सब कुछ दिया बिना मांगे,
तुमने मुझे ही तोड़ दिया अपने ही हाथों से,
क्या यही तुम्हारा प्यार था?
या बस इस्तेमाल करने का व्यवहार था?

धरती पुकारे, अब तो संभल जाओ,
मेरे जख्मों पर थोड़ा मरहम लगाओ,
अगर मैं ही खत्म हो गई एक दिन,
तो तुम कहाँ अपना घर बनाओगे उस दिन।

मैं धरती हूँ, तुम्हारी माँ हूँ,
तुमसे ही मेरी हर पहचान है,
मुझे बचा लो, मुझसे प्यार करो,
क्योंकि तुमसे ही मेरी हर सांस है… 🌱

धरती को बचाने के लिए कविता यह कविता जरुर पढ़ें

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