“Nagasaki Day 2025 | थम  गई साँसें”*

9 अगस्त 1945, सुबह थी... पर सूरज नहीं उगा।

एक शहर था... जो सूरज उगने से पहले राख बन गया।

हवा आज भी दर्द   की कहानी कहती है, नागासाकी की राख कुछ कहती है।

जब बम गिरा था, तो इंसानियत भी ढह गई थी।

विज्ञान आगे निकला, लेकिन नैतिकता पीछे छूट गई।

हवा में आज भी दर्द कहती है, नागासाकी की राख कुछ कहती है।

क्या मिला उस युद्ध से? मातम, मौत और मौन।

बच्चों की हँसी बम की आवाज़ में खो गई।

शांति कोई विकल्प नहीं, वो ज़रूरत है।

विनाश का इतिहास मत बनाओ, संवाद की संस्कृति बनाओ।

एक शहर जला, और पूरी दुनिया शर्मिंदा हुई।

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हमें जीत नहीं चाहिए, हमें ज़िंदगी चाहिए।